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Sanatan Haat

श्रीमदभगवदगीता सिद्धांत Shrimadbhagwadgita Siddhant By: Swami Darshananand Sarswati

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भारतवर्ष में शताब्दियों से श्रीमद्भगवद्गीता का ऐसी महान् महिमा, श्रद्धा तथा सम्मान से पठन-पाठन क्यों है? बड़े-बड़े पाश्चात्य विद्वान् इसकी मुक्तकण्ठ से क्यों प्रशंसा करते हैं? समझनेवाले सभी देशों के मतों के, सम्प्रदायों और सभी विचारों के मनुष्यों की इसकी ओर इतनी अभिरुचि क्यों है?

इसका अनुवाद संसार की प्रायशः सभी मुख्य-मुख्य भाषाओं में क्यों किया गया है? इसका एकमात्र उत्तर यही है कि यह ग्रन्थ आर्यधर्म के मार्मिक तत्वों का भण्डार है। यह ग्रन्थ दार्शनिक विचारों का गूढ़ से गूढ़ रहस्य तथा विषयों का पुंज है। यह सार्वभौम नैतिक सिद्धान्तों का कोष है। साम्प्रदायिक भेदभावों से रहित एक निष्पक्ष ज्ञान विषयक गुटिका है।

ईश्वर के विषय में गीता का सिद्धान्त यह है कि ईश्वर निर्गुण तथा सगुण दोनों है। संसार में चित और अचित दो प्रकार की वस्तुयें मानी जाती हैं। चित् को चैतन्य कहा जाता है और अचित् की श्रेणी में जड़ वस्तुएँ आती हैं।

पृथिवी तथा समुद्र आदि अचित् (जड़) और नाशवान् हैं। मनुष्य का पार्थिव (पंचभौतिक) शरीर भी जड़ है, परन्तु जिनमें चलने, हिलने, बढ़ने तथा घटने की अर्थात् कार्य करने की शक्ति होती है, वे जीव हैं। जिस आदि शक्ति से प्राणी चेतनरूप कहलाते हैं, उसका मूलाधार एकमात्र अव्यय, अमर और निर्विकल्प परमार्थ तत्व वही निर्गुण ईश्वर है। वह इस ब्रह्माड का आदि कारण है। उससे कोई महान् नहीं है। वह सर्वाधार है तथा सृष्टि में ओतप्रोत है। वही जल का जलत्व, सूर्य-चन्द्र की ज्योति और वेदों का पवित्र शब्द एक निरंजन ओङ्कार है। वही पाँचों तत्वों का आधार है। उसके भाग नहीं हो सकते। वह अपनी योगमाया के आश्रित रहता है। वह किसी के लिये भी दृश्य नहीं होता है। वही सर्वदेवों (मूल प्रकृति), सर्वभूतों (विकृति) तथा सर्वयज्ञों (परिणामों) का ज्ञाता और अधिष्ठाता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म और बड़े से बड़ा है। वह प्रत्येक वस्तु मात्र में आदि, मध्य और अन्त तक व्याप्त है। यह गीता का निर्गुण ब्रह्मगीत है जो वेदानुकूल अटल और अक्षुण्ण है। जो सब संसार का स्रष्टा, उपदेष्टा, भर्ता, भोक्ता और प्रलयकर्ता है, वही अनादि तथा अनन्त चराचर का पोषक, तीनों लोकों और अवस्थाओं में व्यापक सगुण ईश्वर है।