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Sanatan Haat

वैदिक नारी (Vedik Nari)-

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हमारे देश में मध्यकाल में बहुत समय तक नारी उपेक्षित तथा अपमानित रही है । इस काल में जो साहित्य रचा गया उसमें भी नारी को निन्दनीय नीचा दिखाने का प्रयत्न किया गया । उसे शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया । किन्तु आज युग बदल गया है । तदनुसार नारी समाज में भी जागृति आयी है । महर्षि दयानन्द ने अन्य समाज सुधारकों के साथ नारी जाति की दशा सुधारने में भी बड़ा योगदान किया था ।

एक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि परिस्थितियों ने नारी को कितना ही प्रताड़ित किया हो , पर नारी की स्थिति के विषय में हमारे वेद क्या कहते हैं ? यह देखकर एक सुखद सन्तोष होता है कि वेदों में नारी की स्थिति अत्यन्त गौरवास्पद वर्णित हुई है ।

वेद में नारी देवी है , विदुषी है , वीरागंना है , वीरों की जननी है , आदर्श माता है , कर्त्तव्यनिष्ठ धर्मपत्नी है , घर की सम्राज्ञी है , सन्तान की प्रथम शिक्षिका है , उपदेशिका बनकर सबको सन्मार्ग बतानेवाली है , जग में सत्य और प्रेम का प्रकाश फैलानेवाली है । वेदों में नारी पूज्य है , स्तुति - योग्य है , रमणीय है , सुशील है , बहुश्रुत है , यशोमयी है । वेदों में नारी का जो स्वरूप प्रतिबिम्बित हुआ है उसी की झाँकि देने के लिए यह पुस्तक लिखी गयी है ।