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Sanatan Haat

वेद प्रवचन - Ved Parvachan By Ganga Prashad

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वेद के स्वाध्यायशील पाठकों , प्रवक्ताओं और आर्योपदेशकों के लिए श्री पं ० गंगाप्रसाद जी का यह ग्रन्थ अत्यन्त उपादेय है । यह ग्रन्थ , जैसा कि लेखक ने अपनी प्रस्तावना में लिखा । इसी उद्देश्य को लेकर ही लिखा गया है । अपूर्व देशभक्त महर्षि दयानन्द ने आर्यों के उपकार के लिए आर्यराष्ट्र भारतवर्ष की सर्वाङ्गीण उन्नति व विकास के लिए इस देश से लुप्त , प्रलुप्त संस्कृति के जिन तत्त्वों को आर्यों के समक्ष अति पुरुषार्थ से और देशभक्ति के भावों से प्रस्तुत किया । वे तत्त्व थे देशभक्ति , ईश्वर , वेद , ब्रह्मचर्य , यज्ञ , गौ आदि । आर्यसमाज के पहली पीढ़ी के विद्वानों , उपदेशकों ने अपने पूर्ण पुरुषार्थ से तन , मन , धन से इन्हीं के प्रचार में अपने को न्यौछावर कर इन्हें इस देश में विस्तार दिया । आगे आने वाली पीढ़ी ने पिछली पीढ़ी के खड़े किये प्रासाद से पूर्ण सुखोपभोग किया । देव दयानन्द व विद्वानों के नामों को भुनाया और कमाया और कमा रहे हैं । कमाना कोई इतना बुरा भी न था पर वे महर्षि की देन को जाने अनजाने समाप्त करने पर तुले हैं । देशभक्ति 5 – प्रथम देश है तो देश में शास्त्र - चर्चा भी संभव है । पर आज देशभक्ति की भावना ही सर्वथा लुप्त है । जब कि महर्षि की यह पहली प्राथमिकता थी । - ईश्वर – ईश्वर के विशुद्ध स्वरूप को महर्षि ने प्रत्यक्ष प्रचारित किया था । आज उसे अनुमान का विषय बनाकर गुरुडम के प्रचार में पौराणिकों से समझौता करके गुरुडम को बढ़ाया ही जा रहा है । वेद – वेद का विशुद्ध पूर्ण वैज्ञानिक ईश्वर प्रदत्त स्वरूप महर्षि ने अपने भाष्य द्वारा प्रस्तुत किया था । आर्यसमाज ने उसके प्रचार को सर्वथा भुला दिया । देश के विद्यालयों , महाविद्यालयों में सायणादि के भाष्य ही पढ़ाये जा रहे हैं ।

शिक्षा तो सर्वथा देश को विनाश के गर्त में ले जा रही है । आर्यसमाज चुपचाप इस सब देशद्रोहिता , गुरुडम , विदेशी संस्कृति के आक्रमणों को मूकदर्शक की भांति देख रहा है ।

ब्रह्मचर्य – ब्रह्मचर्य देश की आधारशिला है । ' राष्ट्रस्य मूलं ब्रह्मचर्यम् " ( चाणक्य ) सभी आर्यसमाजी ब्रह्मचर्य के विघातक सिनेमादियों में बढ़ - चढ़कर भाग लेकर ब्रह्मचर्य के विनाश में पूर्ण सहयोगी हैं । आर्यसमाजियों के समाचार पत्र भी ब्रह्मचर्य के विनाशक सिनेमाओं के प्रचार - प्रसार में मनोरंजन के नाम पर बढ़चढ़कर भाग लेकर ब्रह्मचर्य के विनाश में पूर्ण सहयोगी हो रहे हैं । गुरुकुल के साथ सिनेमा स्थापित हो जाये , पर आर्यों को चेत ही नहीं होता ।

यज्ञ – यज्ञों के बिना मनुष्य जीवन निरर्थक है । महर्षि के लेखानुसार तो यज्ञों को छोड़ने वालों को परमात्मा भी छोड़ देता है । फिर भी महर्षि के विरुद्ध यज्ञों से श्रद्धा समाप्त हो रही है । यह मैंने गुरुकुलों में और बाहर भी देखा है । यज्ञों के नाम पर परम्परा का निर्वाह मात्र का इच्छुक समुदाय बढ़ता जा रहा है ।

गौ – महर्षि ने गोहत्या विरोध के लिए हस्ताक्षर अभियान बड़े रूप से प्रारम्भ किया कराया था । ऋषि के देहावसान के बाद आज तक देश के स्वतन्त्र होने पर भी गोहत्या का कलंक अंग्रेजों के समय से दोगुना ही नहीं चौगुना क्यों कहें , न जाने कितने गुणा बढ़ता ही जा रहा है । दो - दो आँसू बहाने के सिवा क्या शेष रह गया है ।

पाश्चात्य शासकों ने इस देश के विनाश के लिए शिक्षा , इतिहास , खान - पान सब कुछ बदल डाला है जिससे यहां के निवासी उन पाश्चात्यों की बराबरी तक भी न पहुंच सकें । पुनरपि आर्य गहरी निद्रा में निमग्न हैं । आज पाश्चात्यों के मानस गुलाम ही शासक हैं । फिर देशोन्नति कैसे हो ? " दण्ड : शास्ति प्रजाः सर्वाः ॥ " " यथा राजा तथा प्रजा " ॥