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Sanatan Haat

महर्षि दयानन्द का महत्वपूर्ण पत्र व्यवहार - Maharshi Dayanand Ka Mahatvapurn Patra Vyavhar

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महर्षि का अपने समकालीन धर्माचार्यो , समाजसुधारकों , राजा - महाराजाओं के साथ ही साधारण जिज्ञासुओं तथा प्रत्येक वर्ग के सामान्य जन के साथ पत्र व्यवहार हुआ है । साथ ही महर्षि ने समय व स्थान की दृष्टि से अपने मन्तव्यों के प्रकटीकरण तथा प्रतिपक्षी मतों के खण्डन में अनेक विज्ञापन भी प्रकाशित करवाये थे । पण्डित लेखराम आर्य मुसाफिर द्वारा सर्वप्रथम महर्षि जीवन चरित की सामग्री संकलन के समय संगृहीत इन पत्रों का जीवन चरित लेखन में उपयोग किया गया था । महात्मा मुंशीराम ( स्वामी श्रद्धानन्द ) ने इस पत्रव्यवहार का पृथक् ग्रन्थ रूप में सन् १६१० ई ० में सम्पादन प्रकाशन किया ( महर्षि दयानन्द का अपूर्व पत्र व्यवहार , सम्पादक प्रा . राजेन्द्र जिज्ञासु ) । इसे हिन्दी साहित्य के विख्यात समालोचक डॉ ० नगेन्द्र ने हिन्दी साहित्य में पहला प्रकाशित पत्र संग्रह कहा है । इसके पश्चात् पं ० चमूपति , पं ० भगवद्दत्त तथा पं ० युधिष्ठिर मीमांसक ने इन तथा समय - समय पर उपलब्ध नवीन पत्रों का समायोजन करते हुए सम्पादन किया है । पं ० युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा सम्पादित संस्करण तथा परोपकारिणी सभा , अजमेर द्वारा वर्ष ( सन् २०१५ ) दो भाग में प्रकाशित पत्रव्यवहार का सम्पादन करते समय महत्त्वपूर्ण पत्रों का चयन कर एक भाग में सम्पादित करने का विचार प्रबल हुआ । यद्यपि प्रत्येक पत्र अथवा उसकी सूचना महत्त्वपूर्ण है । पुनरपि भागमभाग भरे जीवन में मनुष्य की व्यस्तता को दृष्टि में रखकर कुछ पत्र चयन करने का प्रयत्न किया गया है । पत्रों का चयन करते समय यह विचार केन्द्र में रहा है कि इस प्रकार के पत्र जिनसे महर्षि के बहुआयामी व्यक्तित्व का दिग्दर्शन हो सके । साथ ही पाठक यह भी जान ले कि महर्षि ने जितने भी कार्य किये हैं , वह कितनी विषम परिस्थितियों में किये हैं ?